बहुत दिन बीते, किसी तलाश में हूँ
ख़याल-ओ-ख़्वाब की दुनिया बनाता हूँ, मिटाता हूँ
लफ्ज़ बेमानी सारे लग रहे हैं
मैं चुप हूँ शोर सुनता जा रहा हूँ
मैं अपने अंदर एक दुनिया में गुम
बाहर भी सबसे मिल रहा हूँ
तवाजुन जब बिगड़ता है किताबें पढ़ता हूँ, पर
किताबों में कोई किरदार जो मुझसा नज़र आये
तो एक अंजान डर में घिर-सा जाता हूँ

बहुत दिन बीते किसी तलाश में हूँ
एक ऐसा लफ्ज़ जो सब कुछ बयाँ कर दे
मुझे अल्फ़ाज़ों की इस क़ैद से जो रिहा कर दे

आँखें बंद करने से नींद आने तक की दूरी
मैं गीतों में तय कर रहा हूँ
तकिये पर अपने कान लगाए
सुन रहा हूँ रसोई में बर्तनों की आवाज़ें
ओस के सुख आँसुओं में पा रहा हूँ

कोई पूछे जो दिन की कुल कमाई तो
वही ख़याल जो मरते-मरते
कागज़ पर अपने नक़्श छोड़ गए हैं
उन्हीं का नाम लेता हूँ.

― प्रकाश