फ़ैसले का वक़्त तो कल पर ही टलता रह गया
दुनिया के साँचे में मैं चुपचाप ढलता रह गया

खिड़कियों से छन के आती धूप से जागा हुआ

उठ के महफ़िल से मेरी सब यार अपने घर गए

क्यों *किताब-ए-माज़ी को ले कर मैं बारिश में रहा
*हर्फ़ सारे मिट गए बस एक धुँधलका रह गया

मेरे घर को जाती दिन की आखिरी वो ट्रेन थी

एक ख़त उसने मुझे चमकीली स्याही से लिखा

― प्रकाश

ख़्वाबीदा: dreamy, किताब-ए-माज़ी: book of past, हर्फ़: letters