आज 27 दिसंबर, बहुत लोगों के लिए आम सा दिन है…मगर जो शख्स शायरी से ताल्लुक़ रखते हैं उनके लिए आज का दिन बेहद खास है। आज है भारत में जन्मे सबसे मक़बूल और महान शायर, मिर्ज़ा ग़ालिब की यौम-ए-पैदाइश! ग़ालिब का जन्म 1797 में आगरा में हुआ, बचपन में ही सर से बाप का साया उठ जाने के बाद दिल्ली जाना हुआ, जहाँ इनकी ज़िन्दगी का एक बड़ा दौर गुज़रा। शायरी का हुनर ख़ुदा से माँग कर आये थे, सो 11 की उम्र से ही ग़ज़लें कहना शुरू कर दीं।

अपनी शायरी में दुनिया को अगर किसीने सबसे पहले आईना दिखाने की हिम्मत की है तो वो ग़ालिब ही है, कहते हैं -

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे,

सब्ज़ा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं,

ऐसे सवाल भी शायरी में सबसे पहले ग़ालिब ने ही किये हैं।

ग़ालिब की महानता सिर्फ भाषा के प्रयोग या खूबसूरत शायरी करने से नहीं है, बल्कि ज़िन्दगी की जो उलझन है, दुनिया के रस्म-ओ-रिवाज़ हैं , उसको सबके सामने अपने अनोखे अंदाज में पेश किया है। ग़ालिब की शायरी सिर्फ इश्किया शायरी नहीं है, बल्कि फ़लसफ़ा(philosophy) और तसव्वुफ़(sufism) की अपनी एक दुनिया उनके शेरों में मौजूद है, बक़ौल ग़ालिब -

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ‘ग़ालिब’,

यानी, दुनिया कहती है कि ग़ालिब, तू तसव्वुफ़ जैसे मसाइल पे कितनी बड़ी-बड़ी बातें करता है..तू अगर शराब न पीता तो तुझे हम मौलवियों का सा दर्जा देते.

उनकी एक ग़ज़ल का शेर है -

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामी ख़याल में,

यानी, मेरे ख़याल में ये मज़ामीन(writings) किसी दूसरी दुनिया से आते हैं, मेरे कलम की आवाज़ ऐसी है जैसे ख़ुदा की आवाज़ हो.

शायरी में ग़ालिब खुद के लिए कहते हैं -

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,

आगे जब इन पर जान बूझ कर मुश्किल शेर कहने का इल्ज़ाम लगाया जाता है तो कहते हैं -

न सताइश की तमन्ना न सिले की परवाह,

यही बात एक और जगह कहते हैं, मगर फ़ारसी में -

मुश्किल है जिबस क़लाम मेरा, ऐ दिल,

यानी, मेरा कलाम मुश्किल है, ऐ दिल…तमाम शायरों का कहना है कि आसान लहज़े में अपनी बात कहूँ…मैं कहता हूँ तो मुश्किल है, नहीं कहता तो मुश्किल है..

ग़ालिब की इश्किया शायरी भी किसी से कम नहीं है, मिसाल के तौर पे देखें -

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई,

वो आये घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,

ख़त लिखेंगे, गरचे मतलब कुछ न हो,

सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू,

नींद उसकी है, दिमाग उसका है, रातें उसकी हैं,

करने गए थे उनसे तग़ाफ़ुल का हम गिला,

अपने मेहबूब से ही नहीं, उसके ख़याल से भी बेइंतहा मोहब्बत करते हैं -

संभलने दे मुझे ऐ नाउम्मीदी क्या क़यामत है,

अपनी शायरी के अलावा अपने स्वाभिमानी व्यक्तित्व के लिये जाने जाते थे। अपने लिए कहते हैं -

पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है,

आगे ग़ालिब कहते हैं कि मेरे बाद ज़माने में दूसरा सच्चा आशिक़ नहीं होगा, मेरे मरने पे इश्क़ का शोला राख के रूप में काला लिबास पहन लेगा..

शमा बुझती है तो उसमें से धुँआ उठता है,

फिर ख़ुदा के सामने भी न झुकने की बात करते हुए कहते हैं कि, हम बंदगी में भी आज़ाद मिजाज़ के हैं, ऐसे कि हमने अगर क़ाबा का दर बंद देखा तो हम भी न रुके, वापस आ गए -

बंदगी में भी वो आज़ाद-ओ-ख़ुदबीं हैं कि हम,

फिर जन्नत को मुँह दिखता हुआ कहते हैं कि सिवाए उस शराब के जिसमें मुश्क़ की खुशबू हो, ऐसी कोई चीज़ नहीं कि मुझको जन्नत का तलबगार बनाये -

वो चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़,

ग़ालिब की ज़िन्दगी में दिल्ली के जो हालात हैं, वो इनकी लेखनी में खूब देखने को मिलते हैं, इन्होंने सैकड़ों ख़त लिखे हैं, जिनमें बस दिल्ली का बयान है..कोई आदमी अपने शहर से इतना प्यार शायद ही करता हो जितना ग़ालिब दिल्ली से प्यार करते हैं। उसपर सितम ये है कि इनकी आँखों के सामने ही दिल्ली बर्बाद होती है। 1739 में नादिर शाह का हमला, बाद में 1857 का ग़दर। 1857 के ग़दर का दर्द ग़ालिब अपने ख़तों में इस तरह बयान करते हैं-

अंग्रेज की क़ौम से जो रूसियाह के हाथों कत्ल हुए,

इस सब के अलावा ग़ालिब को इस बात का दुख रहा कि उनकी कद्र किसी ने नहीं जानी, उनके क़लाम को मुश्किल कह कर दरकिनार कर दिया गया, और इतनी महरूमियाँ देखनी पड़ी जो किसी के भी हौसले पस्त कर दें..पर इस शायर ने चुनौतियों का हँस कर मुक़ाबला किया और दिल के सोज़ को लफ़्ज़ों में पिरो कर अमर बना दिया..

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता,

अपने आगे के शायरों में बस मीर और बेदिल को ही इन्होंने ऊँचा मक़ाम दिया है। इनका फ़ारसी क़लाम उर्दू के मुक़ाबले काफ़ी बड़ा है, उर्दू क़लाम ‘दीवान-ए-ग़ालिब’ के नाम से शाया है।

ग़ालिब का नाम उर्दू शायरी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया उनके शायरी को मूलभाषा में, या तर्जुमा पढ़ कर लुत्फ़ उठाती है, और आज दुनिया को अपने इस हीरे पर नाज़ है. बक़ौल ग़ालिब -

और तो रखने को हम देहर में क्या रखते थे,

ज़िन्दगी अपनी जब इस शक़्ल से गुज़री ‘ग़ालिब’,

― प्रकाश